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ज़िन्दगी में रंग तो बहुत आये 
मगर ज़िन्दगी रंगो से बेगानी हो गयी 
ओढ़े तो थे तन पे रंग आज भी
 मगर उन रंगों को देख मुस्कुराने की वजह खो गयी
 खिलखिलाकर हंसा करती थी किसी ज़माने में मैं  भी 
मगर आज तो वजह होने पर भी 
मुस्कुराने की वजह खो गयी  . . 
दूसरों के आंसूं पौंछा करती थी 
अपने आँचल से मैं 
आज मगर उस आँचल को लहराने की वजह भी खो गयी 
लोगों का दुःख समेत जिस आँचल ने 
आज उस आँचल को फैलाने की वजह भी 
खो गयी। 
pragya jain

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