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Showing posts from November, 2014
यह ज़िन्दगी सताती चली  हम भी आंसूं छुपाते रहे  अब चाहते हैं हंसके जीना  तो क्यों तुमने खुशियों को छीना   pragya jain
अँधेरी रात थी  एक आगाज़ था  हम चल रहे थे  जज़्बात बिखर रहे थे  मोती की तरह  फिर आंसू एक छलका  पलकों से गिर कर  आँचल में वो जा सिमटा  फिर आई एक नयी सुबह  और रास्ते हुए जवान  सूरज की किरणों ने फिर  दी ज़िन्दगी जीने की  एक नयी रहा !! pragya jain
कांटो पर चलकर  जब फूलों का किआ इंतज़ार  तब भी तुम न आये  गर्मी में जलकर जब बारिश के आने का किआ इंतज़ार  तब भी तुम न आये  अँधेरे से डरकर  जब किया रौशनी के आने का इंतज़ार  तब भी तुम न  तो अब अपने टूट के बिखरने पर  कैसे कर लूँ  तुम्हारे आने का विश्वास  pragya jain
गुमनाम है हम हमे कोई नाम देदो  मंज़िल की खबर नहीं  हमारे पैरों को रास्तों के निशाँ देदो  pragya jain

And the waves of ocean .... teach !

समंदर का पानी गहरा  लोगों से है कुछ कह रा  जी लो इस जीवन को गहराई से आँखों में न लाना आंसू कभी हर मुश्किल का सामना करना हंसी से  जीवन के दुःख भरे पल काट जाएंगे उजाले में गुम अँधेरे की तरह  जीवन में आगे बढ़कर  देखोगे  जब तुम  नज़र आएगा कोई रौशनी की किरण लिए  तुम्हारे लिए !! तुम्हारे लिए !! Pragya jain