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Showing posts from December, 2014
आज की तारिक भी  हर साधारण तारिक की तरह चली गयी  आज का दिन भी और दिनों जैसा ही था  मगर आज कुछ ख़ास था  कैसा ख़ास ये में कह नहीं सकती  पर कुछ अलग तो था  उस अलग के मायने क्या थे  ये शायद बतला सकूँ  आज लोगों के बीच होक भी तन्हाई थी  आज तुमसे दूर होके  भी तुम्हारी याद आई थी  आज लोगों ने मुझपे रोज़ से कुछ अलग तंज़ कसे  थे  आज में सब कुछ सेहके भी तुम्हारे पास आई थी  आज ही मेरे चेहरे पे रुआंसी आई थी।  pragya jain
ज़िन्दगी में रंग तो बहुत आये  मगर ज़िन्दगी रंगो से बेगानी हो गयी  ओढ़े तो थे तन पे रंग आज भी  मगर उन रंगों को देख मुस्कुराने की वजह खो गयी  खिलखिलाकर हंसा करती थी किसी ज़माने में मैं  भी  मगर आज तो वजह होने पर भी  मुस्कुराने की वजह खो गयी  . .  दूसरों के आंसूं पौंछा करती थी  अपने आँचल से मैं  आज मगर उस आँचल को लहराने की वजह भी खो गयी  लोगों का दुःख समेत जिस आँचल ने  आज उस आँचल को फैलाने की वजह भी  खो गयी।  pragya jain
बंजारे मन ने आज फिर एक सपना देखा  औरों के शहर में फिर  किसी को अपना देखा  पास गया. . . .  हाथ बढ़ाया . . . .  बात की  . . . .  दिल मिलाया . . . .  मुस्काया भी कुछ वक़्त  . . . .  फिर तेज़ हवा चलने लगी  सपनों का वो आइना हिलने लगा  उसी हवा के साथ एक कंकर आया  और  वो आइना टूट गया  चलने को जब पैर उठाये  फिर वो सपनों का आइना  पैरों के तले  बिछी चादर बन गया  दर्द हुआ  . .  चोट लगी . .  आइना अब चुभने लगा  और रात बाद वाही ज़ख्म पैरों के निशां बन गए , ज़िन्दगी की कहानी के बेज़ुबान पन्ने  बन गए . . .  बस यूँही वो हमारे अपने और अपने बेगाने बन गए :):) PRAGYA JAIN
आज ज़िन्दगी  मुझे बड़ी वीरान सी नज़र आई  सूखे पेड़ के पत्तों में भी जान नज़र आई  में दूर कड़ी बाहें फैलाऐ  इंतज़ार करती रही ज़िन्दगी का  वो जाने कब मुझसे टकराकर  मुझे फिर कहीं और नज़र आई !! Pragya jain